आइए जानते हैं आदिवासी समाज का मृत्युभोज(लोकाई) प्रथा पहले और वर्तमान में कैसे होता है

लेख – डाभी किरण(kotdatimes)
20/9/2020

आदिवासी समाज विभिन्न संस्कृतियों का एक उपहार है। आदिवासी समाज की दुनिया भर में एक विशेष प्रकार की “संस्कृति” है। धार्मिक त्यौहार, शादी, अंतिम संस्कार आदि विभिन्न तरीकों से अनुष्ठान करते हैं।जिसमें पहले के समय में ‘ मृत्यु ‘ होती थी तब

“अच्छी हालत”

कुछ वर्षो पहले जब एक पुरुष या महिला की मृत्यु हो जाती है,तो उस घर के सदस्यों, पड़ोसियों,समाज के लोगों द्वारा मृतक के शरीर पर केवल एक सफेद कपड़ा (धोती) रखा जाता था,जिसे कफ़न कहा जाता था। उसके बाद सभी लोग मृतकों के मुंह पर हाथ रखकर प्रार्थना करते थे भगवान उनकी आत्मा को शांति दे। इसके बाद वह शव का अंतिम संस्कार कर देते थे। फिर बारहवें दिन (लोकाचार,लोकाई)
जब पहली बार लोकाई में मिलते थे तो हर कोई, बड़ा या छोटा, लाइन में खड़ा होता और सभी से “राम राम” करता था,फिर लोकाई की शुरुआत होती थी।सभी दामाद, रिश्तेदार और प्रियजन आते और एक रुपए या दो रुपए देते। और जिस गाँव का मृत्युभोज है उस गांव के लोग अपनी कमर पर एक रूमाल बांधके आते ओर दामाद उसे खोलके उसे वापस सिर से बांध देते। उसके बाद सभी दामाद चीनी बांटते और लोकाई अवसर पूरा कर देते।

* वर्तमान समय में “मृत्यु” होने पर”ख़राब परिस्थिति”

वर्तमान में जब कोई पुरुष या महिला की मृत्यु हो जाती है,तो घर के सदस्य, पड़ोसी, समाज के लोग उस शरीर पर दस रुपये, बीस रुपये डालते हैं। और रिश्तेदारों, उस गाँव के दामाद भी महिला है तो 200 रुपये (बसों) की एक साड़ी,और अगर एक आदमी है, तो 200 रुपये के कपड़े का एक टुकड़ा,पैसे के ढेर और कपड़े के ढेर लग जाते हैं। जो किसी काम के नहीं होते हैं। और वे सम्शान में जला दिए जाते हैं। यह एक बहुत बड़ा नुकसान है। इन पैसों का दुर्व्यवहार होता और वह बेकार जाता है।उसके बाद बारहवें दिन गांव के हर दामाद को लोकाई में तम्बाकू (गुटखा) जमा करवाना पड़ता है, जिससे वह समाज के आदमी आदी व्यसनी हो जाता है। और अंत में वह कैंसर का शिकार होता है। साथ ही दामाद अपने सभी ससुराल वालों को रूमाल हरेक को सिर पर बंधवाते है। तदुपरांत बड़े-बड़े पेड़ों को काट दिया गया, लोगों को बसाने के लिए आज मंडप आए,सड़कों पर मृत्युभोज (लोकाईयाँ) होने लगी।


प्राकृतिक से अब थर्मोकोल के कटोरे आए। इसी कारण बहुत खर्चे होते हैं,जिससे लेन-देन भी बढ़ता है। और अगर यह महीने-दर-महीने होता है तो घर में अनाज,यहां तक ​​कि पशुओं को भी मजबूरन बेचना पड़ता है। तो वास्तव में हमारे समाज को बचाने के लिए हम सभी को जागना होगा, बहुत सावधानी बरतनी होगी। और सही कदम उठाना चाहिए। अन्यथा हमारा समाज सबसे पीछे रह जाएगा ।

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