आदिवासी क्षेत्रों में गेहूँ की खेंती करने का तरिका

रिपोर्ट- ( kotdatimes.com)

भारत देश में गेहूँ की विशेषता अनगिनित वानगीयाँ और उपयोग के बारे में हर कोई व्यक्ति जानता होगा।लेकिन उसकी बुवाई और फसल विधियां किस तरह की जाती होगी यह शायद कम मात्रा में ही लोग जानते होंगे। गेहूँ की बुवाई एवं फसल किस तरह होती है आइए जानते है।आदिवासी क्षेत्रों में गेहूँ की बुवाई नवम्बर महीने में ठंडे मौसम के साथ शुरुआत होने लगतीं हैं ।

इस माह में आदिवासी किसान लोंग अपने खेतों की साफ़ सफाई करके सिंचाई के द्वारा पुरे खेत को पानी से अच्छी तरह भिगो लेते हैं। और तीन चार दिन व उसके बाद बैल द्वारा हल से पूरी मेहनत के साथ खेतों की जुताई करते हैं। और फिर बुवाई करने से पहले अन्नदेवता और धरतीमाँ की पूजा अर्चना करने के बाद अपने हाथ से बुवाई (पैरते) करतें हैं। और छोटे- छोटे क्यारा बनाकर जरुरत मुताबिक उनमें रसायणीक खातर और पानी से खेत पिलाते हैं।

फसल निकलने के बाद खेतों में गेहूँ की फसल पूरी धरती पर हरियाली दिखाई देती हैं । और यह फसल लगभग नवम्बर महीने से फरवरी के अंतिम व मार्च महीने में लेते हैं,ओर होली के त्यौहार पर नए गेहूं की रोटियां बनाकर अपने परिवार के साथ खातें है,यह परंपरा पूर्व सालों से चली आई है,यह नजारा अभी भी आदिवासी के कई क्षेत्रों में देखने मिलता है। इस प्रकार किशान गेहूँ की फसल का अधिक उत्पादन करता हैं।

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