आदिवासी समाज में “चढ़ोतरा प्रथा ” क्या है आइए जानें किरण डाभी के शब्दो में

लेख-किरण डाभी

एडिटिंग – अल्का बुंबडिया
24/09/2020(kotdatimes)

आदिवासी समाज में बहुत ऐसे बिन-जरुरी रित-रिवाज प्रचलित हैं। जिससे हमारें आदिवासी समाज को बहुत बड़ा नुकशान होता है। जैंसे की “चढ़ोतरा प्रथा “

हमारें आदिवासी समाज में किसी गाँव में अगर कोई महिला व आदमीं की कोई घटना के कारण मृत्यु हो जाती हैं तो निश्वित कारण जानने के बजाए जिस गाँव के व्यक्ति की मृत्यु हुई हो,इस गाँव के लोंग सब इकट्ठा होकर विभिन्न हथियारों के साथ विरोधी पक्ष स्थान पर(जिस स्थान पर घटना बनी) जाकर हुल्लड़बाजी,चढ़ाई (आक्रमण) करतें हैं। और अनगिनित चीजों व औजारों को नुकशान करतें हैं। जैसे की घरों को आग से जला देना,अनाज,पशुओं व फसल को नूकसान पहुचाना,लोंगो एवं घरों पर पत्थरबाजी करना,और लोगों पर जानलेवा हमला करना,यह कहें कि चढोतरा लेकर आए लोंगो के मन में नफरत की एक तरह की आग लगी हुई होती है। परंतु लोंग नुकसान करते समय यह नहीं सोचते कि यह अपना समाज हैं,अपना ही एक परिवार हैं। यहाँ गुनेहगार कोई भी हो सजा पुरें गाँव के लोगों को मिलतीं है। और साथ ही दोंनो गांव के लोंगो को एक-दूसरे गाँव में आना-जाना बंद हो जाता है। ऐसा क्यों?


जो वास्तवमें गुनेहगार हैं उन्हें दोनों पक्षों को मिलकर सज़ा एवं दंड देना चाहिए। और समाज में समाधान करना चाहिए।
अगर ऐसा ही चलता रहा तो आदिवासी समाज किसी दिन टुकड़ों में एवं एक-एक हिस्सों में बिखर जाएगा।
इसलिए आदिवासी समाज को एक साथ मिलकर सोच-समजकर फ़ैसला लेना चाहिए एवं समाज को बचाना चाहिए।
वर्तमान समय में युवाओं व समाज के कई लोंग शिक्षित एवं समजदार भी है,जिससे आदिवासी समाज में जागरूकता आ सकती है।

आदिवासी समाज के क्षेत्रों में राजस्थान तहसीलों व गुजरात के साबरकांठा,बनासकांठा जिलें के खेडब्रह्मा,पोशीना और दांता तहसील में ज्यादातर प्रचलित हैं।
आदिवासी समाज में यह रिवाज कई वर्षो पहले हमारें पूर्वजों से चलते आ रहा है। इसका एक मुख्य कारण अशिक्षित व असमजदारी का अभाव भी कह सकते हैं। परन्तु वर्तमान समय में शिक्षित समाज होने पर भी यह बिनजरुरी प्रथा दोहराई जा रही है,जो की बिलकुल गलत है और टेक्नोलॉज़ीकल समय में ऐसी प्रथा होना समाज के लिए बहुत दू:ख की बात है।

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