बाकि तो अब भी है बहोत, मगर शुरुआत हुई तो है

मेरी पहली कविता अदिती मेवाडा

अंधेरा घना था, सुबह हुई तो है  ग

ुलाम था कभी मगर आजाद हुए तो है,

प्यारी थी अपनी जान मगर कुर्बानी दी तो है,

मुश्किले बहोत थी, मंजिल मिली तो है,

देर से ही सही देश की तस्वीर बनी तो है,

साथी जाग ना सकेंगे, फिर पर  तिरंगा लहराया तो है,

बहोत कुछ गंवा दिया मगर कुछ पाया तो है,

जो कभी सिर्फ एक सपना था वो हकीकत बना तो है,

बरसो लगे इस दिन के लिए मगर धरती मुस्कुराई तो है,

सुखे पतझडो के बाद हरियाली आई तो है,

रफ्तार थोडी धीमी है, मगर रास्ते मिले तो है,

बाकि तो अब भी है बहोत, मगर शुरुआत हुई तो है,

विश्व गुरु था जो कभी, फिर महाशक्ति बना तो है,

चंद बाते हुई है, अभी सारा कुछ बताना बाकी तो है,

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