मन गोम वाला खीजे ने आदिवासी भाषा की फिल्म के बाद अध्यापक मुरारी जी का पत्र

प्रिय साथी विनोद,
सच्चाई …..आपको सुझाव बहुत मिलेंगे,लेकिन आपको निराश नही होना है | क्योंकि जब आपने हमसे प्रतिदिन 30 मिनिट का समय माँगा तो हमने किसी ने आपको रिप्लाई नही दिया | अब इस मूवी पर कई प्रकार के कमेंट्स हमारे में से कई मित्र करेंगे | कहना आसान है उसे कई गुना करना कठिन है |
मेरे बचपन की घटना है जब मैं STC कर रहा था | मेरे घर की हालत गरीबी की थी | उन्हीं दिनों मेरे गाँववासियों ने अम्बे माता जी का मंदिर बनाने की ठानी सबने अपना आर्थिक सहयोग दिया,एल्किन मेरे पसा देने को पैसा नही था | सो मैंने मंदिर का रंगरोगन में श्रमदान करने की प्रस्तावना रखी | ग्रामवासियों ने कहा ठीक है तुम मंदिर का कलर कर देना | लेकिन जब मैं और मेरे काका का लड़का दोनों ब्रश लेकर काम पर लगे तो एक भाई ने कहा ऐसे आड़ा नही खड़ा ब्रश चलाओ | मैं नोसिखिया था कभी कलर का कम किया नही था,सो उनकी बात मानकर मैं खड़ा ब्रश चलाने लगा | 10 मिनिट हुए दुसरे भाई देखने आये उन्होंने कहा ऐसे खड़ा नही आड़ा ब्रश मारो | मैंने फिर उनके कहे अनुसार किया,एल्किन इतने में तीसरे बंधू आये उन्होंने सुझाव दिया ऐसे नही थपकी मार कर कलर करो |
उन सुझाव देने वालो ने खाली मौखिक रूप से मुझे टोका | लेकिन ब्रश हाथ में लेकर किसी ने प्रेक्टिकल कलर करके नही बताया | तब मैं समझ गया की इनका काम खाली राय देना है,ये देते रहेंगे | मुझे तो माताजी मंदिर का कलर अच्छे से अच्छा करना है | जब हमने उस कार्य को डबल हाथ मारकार पूरा किया तो सभी लोगों ने हमारे काम की सराहना की |
सीख ……………तो आप जानते ही है. मैं क्या समजाऊं
सधन्यवाद
आपका साथी मुरारी

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