मन गोम वाला खीजे ने आदिवासी भाषा की फिल्म के बाद बनवारी लाल बुंबरिया के विचार

आदिवासी जागरूक युवा संगठन , कोटड़ा के विनोद बुम्बरीया द्वारा निर्देशित भीली बोली में बनाई फ़िल्म *मन गोम वाला खीजे* (मुझे गाँव वाले डाँटते है)
लघु फ़िल्म आदिवासी समाज मे व्याप्त लोकाई (मृत्युभोज) पर आधारित है जिसमे इस जो सुधार होना चाहिए उसे दिखाया गया है कैसे लोकाई पर गरीब परिवार पर आर्थिक भार पड़ता है। इस आर्थिक भार को कम करके समाज सुधार की तरफ कदम बढ़ाने को अग्रसर टूड़िया (गुजरात)गाँव के युवा स्वयं आगे आ रहे है जो गाँव मे घर घर जाकर सर्वे के आधार पर आदिवासी समाज की राय जानते है इस सर्वे के अंशो को भी इस फ़िल्म में जगह दी गई।

मेरा आप सब से निवेदन है कि क्योकि हम इस युवा को आर्थिक सहायता तो नही कर पाए लेकिन इस युवा के यूट्यूब चैनल को अधिक से अधिक सब्सक्राइब कर इन युवाओं मेहनत को सलाम कर सकते है आप अधिक से अधिक इस लिंक को शेयर कर इस युवा के जज्बे को बढ़ाए। जो एक तरफ एक NGO कर माध्यम से स्कूली बच्चों को पढ़ता है और इससे प्राप्त वेतन को आदिवासी समाज सुधार पर खर्च कर देता है जो शायद हम नहीं कर पाते है।
तो इतना सहयोग तो कर ही सकते है यूट्यूब चैनल और न्यूज़ पोर्टल kotdatimes.com सब्सक्राइब करें।

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