मैं और वक्त – आदिवासी बेटी की जुबानी

लेखिका -आदिवासी बेटी  

जीवन की भागदोड़ भरी जिन्दगी में मुझे वक्त नही मिलता की आप सभी से कुछ बात कह सकू | पर आज स्वामी विवेकानंद जयंती पर कुछ शब्द आप सभी को कहना चाहती हूँ | मैं भी आपकी तरह अपने जीवन को जीने और उसे बेहतर बनाने में व्यस्त हूँ | किन्तु जब मैं सुनती और देखती हूँ की मेरे आदिवासी समाज में आज भी हमारे गाँव पीछे है जितना विकास होना चाहिए वो नही हो रहा है | मुझे नही मालूम की मैं कैसे कुछ कर सकती हूँ | मैं अपने घर से भी काफी दूर रहती हूँ | कुछ करना चाहती हूँ पर समय नही मिल पाता | कोटड़ा टाइम्स के यूटूब चेनल से अपने क्षेत्र की कई खबरे विनोद जी के द्वारा जो देखने मिलती है उससे लगता है मैं भी कुछ करूँ | पर फिर वहीँ समय और ये ही समय आपको भी कुछ करने से रोकता है | मैं अपने आपको आजाद मानती हूँ | पर समय को लेकर की, मैं समाज के लिए कुछ करूँ पर वहीँ फिर रुक सी जाती हूँ | मेरी तरह आप भी शायद,पर फिर भी कहना चाहतीं हूँ जिन्दगी का कौनसा पल अंतिम हो | क्या पता किसी से मुलाकात हो ना हो | बस थोडा सा ही वक्त,जो मैं, आप और हम सभी देंगे तो वो दिन दूर नही जब हमारे आदिवासी समाज को सभी पर गर्व होगा | 

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