राजस्थान में आज के ही दिन हुआ था जलियावाला भाग से भी भयानक हत्याकांड

रिपोर्ट – कोटड़ा टाइम्स

17/11/2020

दक्षिणी राजस्थान-गुजरात की सीमा पर स्थित स्वाधीनता आन्दोलन के बलिदानी स्थल मानगढ़ धाम पर 17 नवंबर, 1913 को हुए इस हमले का गोविंद गुरु (Govind Guru) के नेतृत्व में आदिवासियों ने मुकाबला किया किन्तु उन्हें बलिदान देना पड़ा। उसी बलिदानी स्थल को अब मानगढ़ धाम के नाम से जाना जाता है। जिसे इतिहास के पन्नों में यथोचित स्थान नहीं दिया गया है। जालियांवाला बाग कांड को अंगेजों ने 13 अप्रैल, 1919 को अंजाम दिया था। इसके करीब 6 साल पहले, 17 नवंबर, 1913 को राजस्थान-गुजरात सीमा पर स्थित बांसवाड़ा जिले में अंग्रेजों ने करीब 1500 भील आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिया था। परंतु आदिवासियाें की इस शहादत को इतिहासकारों ने तवज्जो नहीं दी। मसलन, राजस्थान के इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इसे महज “भीलों का उत्पात” की संज्ञा दी है। जमीन से 1000 फुट ऊंची यह पहाड़ी बांसवाड़ा जिले के आनंदपुरी पंचायत समिति की आमलिया ग्राम पंचायत के अंतर्गत आंबादरा गाँव में स्थित है।

इस स्थान को राष्ट्रीय धरोहर बनाने की मांग बार-बार की जाती रही है। यहां तक कि लोकसभा में भी इसके लिए आवाज उठाई गई परंतु नतीजा सिफर रहा।दरअसल, मानगढ़ गवाह है भील आदिवासियों के अदम्य साहस और अटूट एकता का, जिसके कारण अंग्रेजों को नाकों चने चबाने पड़े थे। हालांकि यह एकजुटता गोविंद गुरू के नेतृत्व में बनी थी, जो स्वयं लंबाडा (बंजारा समाज) के थे। इसके बावजूद गोविंद गुरू का जीवन भील समुदाय के लिए समर्पित रहा। खास बात यह है कि उनके नेतृत्व में हुए इस ऐतिहासिक विद्रोह के निशाने पर केवल अंग्रेज नहीं थे बल्कि वे स्थानीय रजवाड़े भी थे जिनके जुल्मों-सितम से भील समुदाय के लोग कराह रहे थे।


सन 1913 में गाेविंद गुरू के नेतृत्व में बड़ी संख्या में आदिवासी मानगढ़ में जुटे। वे अपने साथ राशनपानी भी लाए थे। उनके विरोधियों ने यह अफ़वाह फैला दी कि आदिवासी रियासतों पर कब्जा करने की तैयारी में जुटे हैं। उस समय गुजरात बंबई राज्य के अधीन था। बंबई राज्य का सेना अधिकारी अंग्रेजी सेना लेकर 10 नवंबर 1913 को पहाड़ी के पास पहुंचा। सशस्त्र भीलों ने बलपूर्वक आयुक्त सहित सेना को वापस भेज दिया। सेना पहाड़ी से थोड़ी दूर पर ठहर गई। 12 नवंबर 1913 को एक भील प्रतिनिधि पहाड़ी के नीचे उतरा और भीलों का मांगपत्र सेना के मुखिया को सौंपा मगर बात बन नहीं पाई। समझौता न होने से डूंगरपुर और बांसवाड़ा के रजवाड़ों ने अहमदाबाद के कमिश्नर को सूचित किया कि अगर जल्द ही “‘संप सभा’” के भीलों का दमन न किया गया तो वे उनकी रियासत लूटकर अपनी रियासत खड़ी करेंगे, जिससे अंग्रेजी सरकार की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। अंग्रेज अधिकारी सतर्क हो गए। वे भीलवाड़ा की मांग से अवगत थे।

इसलिए तुरंत कार्रवाई करते हुए उन्होंने मेवाड़ छावनी से सेना बुला ली। यह सेना 17 नवंबर 1913 को मानगढ़ पहुंची और पहुंचते ही फायरिंग शुरू कर दी। एक के बाद एक कुल पंद्रह सौ लाशें गिरीं। गोविंद गुरु के पांव में गोली लगी। वे वहीं गिर पड़े। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। मुकदमा चला और उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। मगर बाद में फांसी को आजीवन कारावास में बदल दिया गया। अच्छे चाल-चलन के कारण सन 1923 में उन्हें रिहा कर दिया गया। रिहा होने के बाद वे गुजरात के पंचमहल जिला के कंबोई गांव में रहने लगे। जिंदगी के अंतिम दिनों तक जन-कल्याण कार्य में लगे रहे। वहीं सन 1931 में उनका देहांत हो गया। आज भी पंद्रह सौ आदिवासियों की शहादत मानगढ़ पहाड़ी के पत्थरों पर उत्कीर्ण हैं। भीलों ने जिस धूनी को जलाया था, वह आज भी जल रही है।

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1,147 views